Friday, 1 August 2014

दूरस्थ शिक्षा सरकारी एजेडें से बाहर- Dr. Rajan Chopra

बिना डिस्टेंस एजुकेशन कैसे बनेगा स्कील इंडिया- डॉ राजन चोपड़ा
 

दिल्ली यूनिवर्सिटी में चार साल के कोर्स को लेकर देशभर में हंगामा मचा। मंत्रालय से लेकर देशभर के बुद्धिजीवियों और मीडिया में इस बात को लेकर खूब बहस हुई। किसी ने इसे सही बताया तो किसी ने गलत। खैर अच्छी बात ये हुई कि सबकुछ देश के शासकों के मनमुताबिक ही हुआ जैसा आजादी के बाद होता रहा है।  दिल्ली यूनिवर्सिटी की एकेडमिक और एग्ज्यूक्टिव काउंसिल ने चार साल के कोर्स को तीन साल में तब्दील करने की मंजूरी दे दी।

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     दिल्ली यूनिवर्सिटी के रेगुलर कोर्सेस में प्रत्येक साल 54 हजार छात्र दाखिला लेते हैं लेकिन इसके उलट  दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग में 4.5 लाख छात्र पढ़ते हैं लेकिन इनकी बात करने के लिए कोई तैयार नहीं है।  पिछले साल यूनिवर्सिटी में अंडर ग्रेजुएट कोर्स की अवधि को चार साल कर दिया गया लेकिन डीयू के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के छात्रों को अलग द्वीप का समझकर, इससे महरूम रखा गया।

देश विदेश में मशहूर दिल्ली यूनिवर्सिटी के ओपन स्कूल में पढ़ने वाले साढे चार लाख छात्रों के लिए यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के पास कोई ग्रांट नहीं है। दिल्ली यूनिवर्सिटी को करोड़ों रुपए का फंड दिया जाता है लेकिन केवल रेगुलर छात्रों की सुविधाओं के लिए हैं। सवाल उठता है कि क्या ओपन और दूरस्थ शिक्षा हासिल करने वाले छात्र और उनके अभिभावक टैक्स नहीं देते ?

देशभर में करीब 60 लाख छात्र ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग के जरिए शिक्षा हासिल कर रहे जो देश के उच्च शिक्षा दर को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। 60 लाख में 24 लाख के करीब छात्र इग्नू से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा अलग-अलग सेंट्रल, स्टेट और यूनिवर्सिटीज, छात्रों को ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग के जरिए शिक्षा दे रही हैं। भारत में अभी 600 यूनिवर्सिटी और33,000 के करीब कॉलेज हैं और 2020 तक उच्च शिक्षा के दरवाजे पर 5 करोड़ के करीब छात्र दाखिले के लिए खड़े होंगे। इन सभी छात्रों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी सरकार की होगी।

सबसे बड़ी चिंता है कि दूरस्थ शिक्षा के जरिए पढ़ने वाले ज्यादातर छात्र (लड़कियों की अच्छी तादाद)  फर्स्ट ग्रेजुएट हैं यानि परिवार का पहला सदस्य जो उच्च शिक्षा हासिल कर रहा है लेकिन सरकार की बेरूखी साफ झलकती है और सरकारी बेरूखी से शायद इनके हौसले को धक्का भी लग सकता है। इन छात्रों के लिए सरकार के पास न तो कोई योजना और ना ही यूजीसी के पास फंड। इन छात्रों में उनकी तादाद ज्यादा है जो अर्निंग वाइल लर्निंग कंसेप्ट को फॉलो कर रहे हैं।

मोदी सरकार के पहले बजट में नए आईआईटी और आईआईएम खोलने की बात बखूबी की गई और देश के चैहमुंखी विकास के लिए यह जरूरी भी है।  2014-15 में शिक्षा बजट के लिए68,728 करोड़ रुपए आवंटित किए गए है जिसमें उच्च शिक्षा के लिए 16,900 करोड़ रुपए है। अच्छी बात ये कि 2013-14 के मुकाबले इस साल उच्च शिक्षा के लिए करीब 14.98 फीसदी ज्यादा फंड आवंटित किए गए हैं। उच्च शिक्षा राशि में से आईआईटी,आईआईएम जैसे तकनीकी शिक्षण संस्थानों के लिए 7,138.97 करोड़ दिए गए हैं यानि लगभग आधी बजट इन संस्थानों को दिए गए हैं। इस बजट में घोषणा के बाद, अब देश में कुल 18 आईआईएम और 21आईआईटी हो गए।  यूपीए सरकार ने 2008-11 के बीच 7 आईआईएम और 8 नए आईआईटी की स्थापना की थी लेकिन बजट में ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग को लेकर कोई खास योजना नहीं दिखीं। हालांकि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों कह चूके हैं कि ऑनलाइन और आधुनिक तकनीक के माध्यम से देश के प्रत्येक कोने में बैठे छात्रों को उच्च शिक्षा देने की जरूरत हैं।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के हाल के उदाहरण से साफ है कि फर्स्ट ग्रेजुएट छात्र सरकार के एजेंडे से शायद बाहर हैं क्योंकि उच्च शिक्षा के लिए आवंटित बजट मशहूर संस्थानों को दिए गए हैं।  सरकार ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग के छात्रों की मदद नहीं कर रही हैं। इन छात्रों से बतौर फीस लिए गए पैसों का भी इनपर खर्च नहीं किया जा रहा है।  अभी हाल ही में डीयू के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के सैकड़ों छात्रों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन कर प्रत्येक छात्र के लिए 40,000 रुपए का बजट आवंटित करने का प्रावधान करने की मांग की।

विदेशी यूनिवर्सिटीज में ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग जरिए न केवल पारंपरिक बल्कि आधुनिक शिक्षा बखूबी दी जा रही हैं और यह काफी लोकप्रिय भी है और लोकप्रिय होने का साफ मतलब है कि इस तरह के कोर्सेस से छात्रों को फायदा हो रहा है तो फिर भारत में इसपर अलग अलग रूप में प्रतिबंध क्यों हैं ?

संसाधनों की कमी को देखते हुए उच्च शिक्षा दर को बढ़ाने के लिए देशभर में दूरस्थ शिक्षा को लागू किया था। छात्रों के बढते तादाद को देखते हुए इग्नू के तहत 1991 में दूरस्थ शिक्षा परिषद का गठन किया गया जिसका काम दूरस्थ शिक्षा पर नजर रखना था लेकिन दूरस्थ शिक्षा परिषद के नियमों में कभी भी एकरुपता नहीं दिखीं। ओपन एंड डिस्टेंस लर्निंग को कभी चलाने की इजाजत दी गई तो कभी रोक लगा दी गई। हर समय नियमों को लेकर संशय की स्थिति बनी रही। लिहाजा शिक्षा के सभी शेयरधारकों के बीच डर का माहौल बना रहा। अभी हाल के वर्षों में प्राइवेट यूनिवर्सिटी की तादाद में भारी बढ़ोतरी हुई है और उम्मीद की जा रही थी कि इससे उच्च शिक्षा के दर में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलेगा लेकिन सरकार की नीतियां यहां भी आड़े आ रही हैं। यूनिवर्सिटी, कॉलेज और इंस्टीट्यूट चलाने वाले शेयरधारकों का मानना है कि दूरस्थ शिक्षा को लेकर कोई भी नियम बनें लेकिन स्पष्ट और निश्चित साल के लिए हो ताकि शिक्षा के शेयरधारकों के बीच किसी तरह की कोई संशय की स्थिति न रहे।

पिछले साल अगस्त महीने में डिस्टेंस एजुकेशन ब्यूरो ने नया नियम लागू कर दिया और आदेश दे दिया कि कोई भी यूनिवर्सिटी अपने क्षेत्रीय कार्यधिकार के बाहर जाकर दूरस्थ शिक्षा नहीं दे सकती है जबकि पिछले साल तक इस तरह की कोई रोक नहीं थी। आखिर अचानक नियम में बदलाव में क्यों किए गए। अगर नियम पर बदलाव किए गए तो पहले किस आधार पर अनुमति दी गई थी  शेयरधारकों ने नियम को देखते हुए पूंजी लगाई और एक इंफ्रा खड़ा किया और एक झटके में बदलाव के बाद इनके पास क्या रास्ता है  क्या देश की नीति निर्धारण में इस तरह के केजुएल अप्रोच को बर्दाश्त किया जा सकता है और अगर नहीं तो जिम्मेदार कौन लोग हैं इन सभी पहलूओं की जांच करने की आवश्यकता है।

सबसे मजेदार बात ये है कि नोएडा स्थित कोई भी यूनिवर्सिटी अगर 800 किलोमीटर दूर गाजीपुर और गोरखपुर में दूरस्थ शिक्षा दे सकता है तो तीन चार किलोमीटर दूर राजधानी दिल्ली के छात्रों को क्यों नहीं। आखिर मसकद है देश के युवाओं को शिक्षित और प्रशिक्षित करना तो नोएडा स्थित किसी यूनिवर्सिटी दिल्ली में कोर्स चलाने की इजाजत क्यों नहीं मिलनी चाहिए।

सवाल ये भी उठ रहा है कि इस तरह के फैसले में कहीं किसी को फायदा पहुंचाने की मंशा तो शामिल नहीं है। मुक्त बाजार और नियम के तहत सभी को अधिकार है कि वो शिक्षा दें और ये छात्रों और अभिभावकों के विवेक पर छोड़ दें कि वे किस यूनिवर्सिटी से किस मोड( रेगुलर और दूरस्थ) में पढ़ाई करना पसंद करते हैं। बाजार का नियम भी साफ है कि जो क्वालिटी एजुकेशन देगा वहीं बाजार में टिकेगा नहीं तो बाहर हो जाएगा।

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Monday, 28 July 2014

Saturday Bhandara- Dr. Rajan Chopra

















Man of principles and morale values : Dr. Rajan Chopra, A very down to earth and helpful human being here distributing free meals to the people. For more information about DR. Rajan Chopra Visit Online- www.rajanchopra.in

Thursday, 17 July 2014

Join hands with Rajasthan Govt. In the presence of Honb'le Chief Minister Smt. Vasundhara Raje

Join hands with Rajasthan Govt. In the presence of Honb'le Chief Minister Smt. Vasundhara Raje for skilling project with ICT enable tablet classrooms/Virtual Labs n Live Distance learning to make Shiksith Rajasthan Vikshit Rajasthan !


DR. Rajan Chopra

DR. Rajan Chopra

DR. Rajan Chopra

DR. Rajan Chopra

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Saturday, 12 July 2014

Never Ending Success Graph of Dr. Rajan Chopra

In the field of education, the contribution of Dr. Rajan Chopra is commendable which cannot be described in words. His thought to provide education among deprived students on a global scale has brought a major change in the society. Promoting skill development courses to skill the unskilled and making them financial independent is one of his key achievements other than the Management, IT, professional and traditional courses for under-graduate and post-graduate programs.

And now Dr.Rajan Chopra has been appreciated by the Representative Ed Royce(Member of Congress-39th District) who honored Dr. Rajan Chopra by “Certification of Congressional Recognition” for his contribution to global higher education.
Dr. Rajan chopra

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Thursday, 10 July 2014

Social Service- Dr. Rajan Chopra



Dr. Rajan Chopra distributing fruits to the needy and poor girls. Thus serving mankind. The picture itself describes so many emotions. DR. Rajan Chopra is a man of principle who helps the society. 

"“When you do "it" right, Social Work is a feeling that is larger than you own life.
Ogden W. Rogers,

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In the picture above, Dr Rajan Chopra distributing food to the poor and needy. He is a man of values and believes in helping the people who are in need.


 
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